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कर्ज से हारता 'सिकंदर महान' का देश..!

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लेना घाटे का सौदा होता है। प्रलोभन ऐसा कि इससे बचता भी कोई नहीं है, किन्तु कई बार यह समय को बलिष्ठ कर टेके का इतना अच्छा इंतजाम करा देता है कि कर्ज भी निपटा दिया जाता है और अपना मूल भी कायम रहता है। किन्तु यह भी तब जब इस खेल को समझने और खुद को लायक बना लेने जैसा विश्‍वास हो। कर्ज की दुनिया इसी भरोसे और इसी नीयत से चलती है। किन्तु अगर यह किसी देश को ही लपेटे में ले ले तो? फिर कंगाल देश दुनिया में कैसे खड़ा रह सकता है? और ऐसी स्थिति आती कैसे है? कई प्रश्न आज ग्रीस के समक्ष खड़े हैं, तो पूरा यूरोप इस प्रश्न से हताहत है। यूरोप के दो तगड़े देश फ्रांस और जर्मनी को शायद कुछ न हो, किन्तु अन्य देश में अर्थ व्यवस्था का डांवाडोल मामला गले की हड्डी है। पूरी दुनिया बाजार पर टिकी है।इस बात में कोई दो राय नहीं कि सभ्यता-संस्कृति जैसे शब्द देश को टेका देने वाले भले ही माने जाते रहे,  लेकिन बाजार से ही सारा समाज और सभ्यता इत्यादि कायम है। बाजार मजबूत तो देश मजबूत। बाजार में बने रहने के लिए ही कर्ज लिया जाता है, और बाजार से ही कमा कर कर्ज पूर्ति भी संभव है। यह सौदा है। सौदेबाजी में पटखनी मिलना एक पूरे देश को तहस-नहस कर सकता है। आप देखें आज ग्रीस की हालत दयनीय है। कर्ज के प्रलोभन में फंसे ग्रीस को शायद पता नहीं था कि पानी गले तक आ जाएगा और वह डूब जाने जैसी हालत में हाथ-पैर पटकने लगेगा। यह स्थिति कोई अचानक पैदा नहीं हुई है।ग्रीस के वर्तमान हालात का जायजा लेने यदि पीछे जाएं, तो डेढ़ दशक पहले ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी। ग्रीस ने भयंकर भूकम्प झेला था और तबाह हुए ऐतिहासिक शहरों के आधारभूत ढांचों और खासकर अपने जनमानस के आत्‍मविश्‍वास को फिर से खड़ा करने के लिए उसे कर्ज लेने की स्थितियों की ओर धकेला था। बाजार ऐसे हालात को बड़ी मछली मानता है। उसने ग्रीस को लुभाया। अपनी बात-अपनी शर्त मनवाई। ग्रीस यूरो जोन में कर्ज के लालच से ही शामिल हुआ था। फिर कुछ सरकारें ऐसी भी आई जो इस लोभ का दायरा बढ़ाती रहीं। 2004 में ग्रीस ने ओलम्पिक आयोजन कराया। करीब 12 अरब डॉलर से अधिक की राशि इस पर खर्च हुई थी। पहले भूकम्प से तबाह देश को बनाने के लिए धन व्यय, इसके बाद ओलम्पिक। यूरो जोन ग्रीस को लालच में बांध चुका था। 2010 में ग्रीस ने यूरो जोन, यूरोपियन सेंट्रल बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 10 अरब डॉलर का राहत पैकेज लिया। इसके बाद दूसरा राहत पैकेज भी उसे मिल गया। पर, ग्रीस को सुधारों की राह पर जितना तेज चलना था उतना ही धीमा हो गया। राहत पैकेजों की शर्ते होती है, जिसका पालन करने में वह विफल रहा। बावजूद उसे आइएमएफ की मदद भी मिल गई, वह भी इस वजह से कि शायद अब वह खड़ा हो जाए।यह ग्रीस की बदकिस्मती है या किस्मत कि इसी दौरान संसदीय चुनाव में वहां वामपंथी सीरिजा पार्टी की सरकार बन गई, जिसने चुनाव में यह वादा किया था कि वह बेलआउट की शर्तों को ठुकरा देगा। इससे लोगों की परेशानी और बढ़ गई। आप देखिये कि महज 1.0 करोड़ आबादी वाले देश पर 340 अरब यूरो का कर्ज चढ़ बैठा है। कर्ज चुकाने की मियाद लगातार खत्‍म होते जा रही है। पूरा देश आशंका और आर्थिक संकट के जाल में फंसा हुआ नजर आने लगा है।ग्रीस सिकंदर महान का देश है। दुनिया को अपने कदमो में बिछा देने वाले सिकंदर के इस देश की ऐसी हालत होगी कौन जानता था, मगर सौदेबाजी की दुनिया में दांव का गलत पड़ना डिफाल्टर की श्रेणी में ला खड़ा करता है। जी हां, अगर ग्रीस अपना कर्ज चुकता न कर पाया तो उसे 21 वीं सदी का पहला डिफॉल्टर देश घोषित कर दिया जाने वाला है।ग्रीस इस वक्त 11 लाख करोड़ रुपए से अधिक के कर्ज की पहली किस्त 12 हजार करोड़ रुपए चुकाने की डेडलाइन के करीब आ चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अपनी इस डेडलाइन को तब तक आगे बढ़ाने को तैयार नहीं है। जब तक ग्रीस उसकी शर्तें नहीं मान लेता। वैसे, समय सीमा नहीं बढ़ाता, लेकिन उम्‍मीद है कि वह ग्रीस को 5 जुलाई तक का समय दे दे।अब देखिये ग्रीस के आर्थिक संकट से स्थितियां कैसी होंगी? दुनिया भर के शेयर बाजारों की नजर ग्रीस पर लगी है और 5 जुलाई को होने वाले जनमत संग्रह तक वे खामोश हैं। क्योंकि आईएमऍफ़ की शर्ते मानी जाए या नहीं, ग्रीस के नागरिक मतदान करेंगे। और अगर मान लीजिये ग्रीस ने आर्थिक सुधारों की मांग को खारिज कर दिया तो वह 20 जुलाई को होने वाली यूरो जोन की बैठक में उसे डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाना है साथ ही यूरोपियन और यूरो जोन से ग्रीस को बाहर कर दिया जाएगा।ग्रीस का आर्थिक ढांचा चरमराता नजर आ रहा है। बैंक बंद हैं। एटीएम बंद हैं। लोग बाहर किसी भी तरह कोई पैसा नहीं भेज सकते। शेयर बाजार पर टाला है। अपने 11.14 लाख करोड़ रुपए के कर्ज से निपटने के लिए ग्रीस इंतजाम में लगा है।विश्व के आर्थिक संकट की भविष्यवाणी गवर्नर रघुराम राजन ने भी की है। उनकी भविष्यवाणी को अब कोई भी देश हलके में लेने की गलती नहीं कर रहा है क्योंकि इसके पहले जब रघुराम ने कहा था तब उन्हें हाशिये पर रखा था और नतीजा यह निकला था कि विश्व आर्थिक संकट से गहराने लगा था। स्थितियां अब भी वैसी की वैसी हैं।यूरोप आर्थिक संकट में है। इसका असर भारत पर भी होगा, किन्तु फिलवक्त इतना असर नहीं होगा, जितना यूरोप के कई देश झेलेंगे। कहा तो जा रहा है कि ग्रीस के आर्थिक संकट के चलते भारत से पूंजी निकासी जोर पकड़ सकती है। हालांकि सरकार स्थिति से निपटने के लिए रिजर्व बैंक के साथ विचार-विमर्श कर रही है। वैसे भी भारत का कर्ज जीडीपी के मुकाबले 68 फीसदी है। भारत के कुल निर्यात में ग्रीस का हिस्सा 0.1% है, जबकि आयात में 0.03% है। लिहाजा, दिक्कत मुद्रा की वजह से आएगी। अगर यूरो ज्यादा गिरा तो यूरो जोन को निर्यात प्रभावित होगा। शेष भारत तमाम स्थिति से निपट सकता है। यानी भारत के लिहाज से अभी कोई घबराने वाली बात नहीं है। किन्तु सबक के तौर पर इसे लिया जा सकता है और अपनी कमर अभी से ही कसी जानी भी चाहिए ताकि खराब स्थितियों से निपटा जा सके। (Sabhar:IBN 7)

Report :- Desk
Posted Date :- 06-07-2015
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